मुर्रा भैंस के ट्रांज़िशन की समस्याएँ — दुग्ध ज्वर और लाल पेशाब की बीमारी
Vikas Industrial Corporation, खन्ना, पंजाब द्वारा
भैंसों को ब्याने के समय वही समस्याएँ नहीं होतीं जो गायों को होती हैं। दुग्ध ज्वर कम क्यों होता है, फॉस्फोरस की कमी से होने वाला 'लाल पेशाब' उत्तर भारतीय खेतों पर बड़ी चिंता क्यों है, और कौन-से चारे जोखिम बढ़ाते हैं।
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भैंस केवल काली गाय नहीं है
गाय और भैंस, दोनों शुरुआती दूध के साथ कैल्शियम और फॉस्फोरस गँवाती हैं, फिर भी भैंसों को दुग्ध ज्वर मवेशियों की तुलना में कम होता है और फॉस्फोरस की कमी से होने वाला हीमोग्लोबिन्यूरिया, यानी लाल पेशाब की बीमारी, ज़्यादा होती है। इस अंतर के कारण अच्छी तरह समझे नहीं गए हैं, इसलिए गायों के लिए लिखी सलाह को जस का तस भैंसों पर लागू नहीं किया जा सकता (Purohit et al., 2013)। यह लेख भारतीय पशु-चिकित्सा शोध के आधार पर भैंस के ब्याने के आसपास की उन दो समस्याओं को समझाता है जो सबसे ज़्यादा मायने रखती हैं।
भैंसों में दुग्ध ज्वर: कम होता है, पर होता है
पंजाब के निजी और संगठित फ़ार्मों पर ब्याई 9,432 भैंसों के एक सर्वेक्षण में पार्चुरिएंट पैरेसिस, यानी दुग्ध ज्वर का पशु-चिकित्सीय नाम, 3.1% में मिला, और 80% मामले जुलाई से दिसंबर के बीच के थे (Purohit et al., 2013, इस सर्वेक्षण का हवाला देते हुए)। उसी अध्याय में उद्धृत अन्य अध्ययन लगभग 3 से 30% तक कुछ भी बताते हैं, इसलिए अलग-अलग झुंडों में जोखिम बहुत अलग होता है। प्रभावित भैंसें आमतौर पर अपने 3 या 4 ब्यांत में होती हैं। जो भैंस अभी ब्याई हो और अचानक कमज़ोर, लड़खड़ाती या लेटी हुई हो, शरीर ठंडा हो और सिर कोख की ओर मुड़ा हो, उसे कैल्शियम की आपात स्थिति मानना चाहिए। अध्याय में कहा गया है कि इलाज को प्रयोगशाला की रिपोर्ट का इंतज़ार नहीं करना चाहिए।
जब भैंस गिर जाए तो क्या करें और क्या न करें
तुरंत पशु चिकित्सक को बुलाएँ। नसों में दिया जाने वाला कैल्शियम 10 से 20 मिनट में धीरे-धीरे दिया जाना चाहिए और इस दौरान दिल की निगरानी होनी चाहिए, क्योंकि तेज़ी से चढ़ाने पर दिल की धड़कन में जानलेवा गड़बड़ी हो सकती है (MSD Veterinary Manual, गायों के लिए)। जो पशु ठीक से निगल नहीं पा रहा, उसके मुँह में तरल, पेस्ट या जेल न डालें; MSD मैन्युअल गायों में कैल्शियम के मुँह से दिए जाने वाले पेस्ट, जेल और तरल के विरुद्ध सलाह देता है क्योंकि साँस की नली में चले जाने (एस्पिरेशन) का ख़तरा रहता है। पशु चिकित्सक के आने तक उसके नीचे मोटा, सूखा, फिसलन-रहित बिछावन रखें। सफल इलाज के एक-दो दिन बाद भी दोबारा गिरावट (रिलैप्स) हो सकती है, इसलिए 48 घंटे तक उस पर नज़र रखें (Purohit et al., 2013)। ब्याने के दिन हर पशु को नियमित रूप से कैल्शियम का इंजेक्शन लगाने की सलाह नहीं दी जाती: MSD मैन्युअल ब्याने पर नियमित नसों वाले कैल्शियम को हतोत्साहित करता है, क्योंकि जिन गायों को यह दिया गया उनमें 24 घंटे तक कैल्शियम की कमी और बढ़ गई।
ब्याने के बाद लाल पेशाब: पार्चुरिएंट हीमोग्लोबिन्यूरिया
पार्चुरिएंट हीमोग्लोबिन्यूरिया अधिक दूध देने वाली भैंसों और गायों की एक तीव्र, जानलेवा बीमारी है जिसमें ख़ून में फॉस्फोरस बहुत गिर जाता है और लाल रक्त कोशिकाएँ रक्त वाहिकाओं के भीतर ही फट जाती हैं, जिससे पशु में ख़ून की कमी हो जाती है और वह लाल से कॉफ़ी जैसे रंग का पेशाब करता है (Purohit et al., 2013)। यह गर्भावस्था के आख़िरी दिनों में और ब्याने के बाद के पहले 60 दिनों में दिखती है, सबसे ज़्यादा 3 से 5 ब्यांत में। पशु शुरू में खाता रह सकता है, इसीलिए बीमारी पकड़ में नहीं आती, लेकिन दूध घटता है, मसूड़े और पलकें फीके पड़ जाते हैं, गोबर सख़्त और काला हो जाता है, और बीमारी बढ़ने पर वह कमज़ोर हो जाती है और उसमें पीलिया जैसा पीलापन आ जाता है। कई अध्ययनों में मृत्यु दर 12 से 15% बताई गई है, और नतीजा इस पर निर्भर करता है कि इलाज कितनी जल्दी शुरू हुआ। उसी अध्याय के अनुसार यह बीमारी हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और पंजाब के कुछ हिस्सों में कहीं ज़्यादा पाई जाती है। लाल पेशाब किसी और कारण से आया सादा ख़ून भी हो सकता है, इसलिए पशु चिकित्सक को जाँच से इसकी पुष्टि करनी चाहिए।
भूसा, बरसीम और सरसों जोखिम क्यों बढ़ाते हैं
यह बीमारी फॉस्फोरस की कमी से जुड़ी है। अध्याय में गन्ने के ऊपरी पत्ते, सरसों, पत्तागोभी, लूसर्न और बरसीम को उन चारों में गिना गया है जो फॉस्फोरस की कमी ला सकते हैं, और कहा गया है कि गेहूँ और धान का भूसा/पराली तथा मक्का, ज्वार और बाजरे के डंठल फॉस्फोरस के बहुत कमज़ोर स्रोत हैं (Purohit et al., 2013)। आँकड़े कारण दिखाते हैं: बरसीम में औसतन लगभग 1.9% कैल्शियम होता है पर फॉस्फोरस केवल 0.27%, और गेहूँ के भूसे में केवल लगभग 0.07% फॉस्फोरस (Feedipedia)। मौसम को लेकर अध्ययन एकमत नहीं हैं: कुछ में सर्दी में ज़्यादा मामले दर्ज हुए, कुछ में गर्मी में, संभवतः इसलिए कि पशुओं को उस समय क्या खिलाया जा रहा था। चारे में ज़्यादा मॉलिब्डेनम या पोटैशियम और ताँबे की कमी हालात और बिगाड़ सकते हैं। एक अध्ययन में महत्वपूर्ण जोखिम कारक थे: 7 साल या उससे ज़्यादा उम्र, 7 महीने या उससे ज़्यादा की गर्भावस्था, तीसरा या उसके बाद का ब्यांत, सरसों जैसे क्रूसिफ़ेरस पौधे खाना, और पहले एक बार बीमारी हो चुकी होना। जिस भैंस को यह बीमारी एक बार हो चुकी थी, उसमें दोबारा ख़ून का फॉस्फोरस कम होने की संभावना 21 गुना ज़्यादा थी।
रोकथाम: फॉस्फोरस, मिला-जुला चारा और पहले से तैयार राशन
पहला नियम है फॉस्फोरस की पर्याप्त मात्रा, ख़ासकर गर्भावस्था के आख़िरी दिनों और दूध देने के शुरुआती दिनों में (Purohit et al., 2013)। क्योंकि बरसीम में फॉस्फोरस कम होता है और उसमें एक ऐसा तत्व होता है जो लाल रक्त कोशिकाओं को नुकसान पहुँचा सकता है, अध्याय सुझाव देता है कि उसे अकेला हरा चारा बनाने के बजाय दूसरे चारों के साथ मिलाकर खिलाया जाए। जहाँ मिट्टी या फ़सलों में फॉस्फोरस की कमी हो, वहाँ आहार या पानी में फॉस्फोरस का स्रोत देने की सलाह दी जाती है, लेकिन स्रोत और मात्रा का चुनाव अंदाज़े से नहीं, आपके पशु चिकित्सक या कृषि विज्ञान केंद्र की सलाह से होना चाहिए। गुजरात का एक क्षेत्रीय परीक्षण भी यही संकेत देता है: जिन गाँव की भैंसों को ब्याने से पहले और बाद 2 महीने तक रोज़ 1.5 किलो 22% प्रोटीन वाला दाना मिश्रण और 50 ग्राम चिलेटेड क्षेत्र-विशेष खनिज मिश्रण दिया गया, वे जल्दी हीट में आईं और उनका सर्विस पीरियड छोटा रहा (Kalasariya et al., 2017)। उस परीक्षण में प्रजनन क्षमता नापी गई थी, लाल पेशाब नहीं, लेकिन वह दिखाता है कि ब्याने के आसपास योजनाबद्ध खिलाई क्या कर सकती है।
भैंस पालकों के लिए ब्याने की जाँच-सूची
गर्भावस्था के आख़िरी 3 सप्ताह में बरसीम, सरसों या गन्ने के ऊपरी पत्तों को मुख्य चारा न बनाएँ, और केवल भूसे के भरोसे न रहें। हर भैंस का ब्यांत क्रमांक नोट करें, और 3 से 5 ब्यांत की भैंसों तथा उन भैंसों पर, जिन्हें पहले लाल पेशाब हो चुका हो, सबसे ज़्यादा नज़र रखें। ब्याने के बाद के पहले 2 महीने रोज़ पेशाब का रंग देखें। उसी दिन पशु चिकित्सक को बुलाएँ अगर भैंस खड़ी न हो पाए, उसका पेशाब लाल या कॉफ़ी जैसे रंग का हो, उसके मसूड़े फीके पड़ गए हों, या दूध अचानक घट जाए और गोबर सख़्त व काला हो जाए। पशु चिकित्सक को ठीक-ठीक बताएँ कि वह कब ब्याई और उसे क्या खिलाया गया, क्योंकि इसी इतिहास से तय होता है कि कैल्शियम की ज़रूरत है, फॉस्फोरस की, या किसी और चीज़ की। गर्मी में ब्याने की योजना ठंडक को ध्यान में रखकर बनाएँ, जैसा कि सूखे और ब्याने के क़रीब वाले पशुओं को ठंडा रखने पर हमारे लेख में बताया गया है।
जो हम अभी भी नहीं जानते
भैंसों के ट्रांज़िशन पर ज़्यादातर शोध कुछ संस्थानों और छोटे अध्ययनों से आता है, और हमें पंजाब में लाल पेशाब की बीमारी का कोई हालिया ज़िलेवार माप नहीं मिला। ऊपर बताया गया पंजाब का दुग्ध ज्वर सर्वेक्षण वह सबसे अच्छा स्थानीय आँकड़ा है जो हमें मिला। अगर आपके गाँव में भैंसें लाल पेशाब से मरी हैं, तो अपने पशु चिकित्सक और स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र को बताएँ, क्योंकि ऐसे रिकॉर्ड से ही क्षेत्र-विशेष सलाह तैयार होती है।
भैंसों में ब्याने के समय का ख़तरा अक्सर कैल्शियम की कमी से ज़्यादा फॉस्फोरस की कमी होता है। ब्याने के बाद 2 महीने तक पेशाब का रंग देखें, ब्याने के क़रीब केवल भूसे या बरसीम पर न रखें, गिरी हुई भैंस को आपात स्थिति मानें, और अपने पशु चिकित्सक से ऐसी फॉस्फोरस योजना माँगें जो आपके चारे और इलाक़े के अनुकूल हो।
स्रोत
इस लेख के आँकड़े नीचे दिए गए प्रकाशित स्रोतों से लिए गए हैं। हर लिंक मूल शोध-पत्र या संदर्भ पृष्ठ खोलता है।
- Purohit GN, Gaur M, Saraswat CS, Bihani DK (2013). Metabolic disorders in the parturient buffalo. In: Purohit GN (ed.), Bubaline Theriogenology. International Veterinary Information Service (IVIS).
- MSD Veterinary Manual. Parturient paresis in cows.
- Feedipedia. Berseem (Trifolium alexandrinum), aerial part, fresh.
- Feedipedia. Wheat straw.
- Kalasariya RM, et al. (2017). Effect of peripartum nutritional management on plasma profile of steroid hormones, metabolites, and postpartum fertility in buffaloes. Veterinary World 10:302–310.
